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पत्थर के आँसू (कथा-कहानी) - ब्रह्मदेव Click To download this content    
Author:ब्रह्मदेव

जब हवा में कुछ मंथर गति आ जाती है वह कुछ ठंडी हो चलती है तो उस ठंडी–ठंडी हवा में बिना दाएँ–बाएँ देखे चहचहाते पक्षी उत्साहपूर्वक अपने बसेरे की ओर उड़ान भरते हैं। और जब किसी क्षुद्र नदी के किनारे के खेतों में धूल उड़ाते हुए पशु मस्तानी चाल से घँटी बजाते अपने घरों की ओर लौट पड़ते हैं उस समय बग़ल में फ़ाइलों का पुलिन्दा दबाए, हाथ में सब्जी. का थैला लिए, लड़खड़ाते क़दमों के सहारे, अपने झुके कंधों पर दुखते हुए सिर को जैसे–तैसे लादे एक व्यक्ति तंग बाज़ारों में से घर की ओर जा रहा होता है।

'अरे एक बात तो भूल ही गई,’ क़लम ने फिर कहा। ‘उन्होंने पत्र के अंत में हम सब को भी याद किया था।'
'अरे कैसे?' सब ने आश्चर्य से पूछा।

‘उन्होंने लिखा कि काश मैं पेपरवेट होता, मेज़–कुर्सी की तरह फ़र्नीचर होता तो आज यह दिन न देखना पड़ता। चाहें जो होता पर मैं इनसान न होता।’

‘ओह, तभी तो मुझे उठा कर अपने गालों से सहला रहे थे।’ पत्थर के पेपरवेट की ठस्स आवाज़ गीली हो उठी, उसके आँसू झिलमिला उठे।

अधपकी झब्बेदार बेतरतीब मूँछें, चेहरे पर कुछ रेखाएँ–जिन की गहराइयों में न जाने कितने अरमान, आशाएँ और अतृप्त साधें सदा के लिए दफ़न हैं और जिन्हें संसार के सबसे क्रूर कलाकार चिन्ता ने अपने कठोर हाथों से बनाया है। घिसा हुआ कोट जो कि दो साल पहले बड़ी लड़की की शादी पर बनवाया था, पहने और अपनी सूखी टाँगों पर अति प्रयोग के कारण पायजामा बन चुकी पतलून से ढँके कठपुतली की तरह निर्जीव चाल से चला जा रहा यह व्यक्ति मानव समाज का सब से दयनीय प्राणी दफ़्तर का बाबू है। नाम छोटा बाबू - क्योंकि बड़े साहब के बाद इन्हीं का नंबर है, पर काम है बड़े साहब से भी अधिक। दफ़्तर बंद हो गया है, घर जा रहे हैं। इन के बाद दफ़्तर में क्या होता है– शायद इन्हें पता नहीं। शायद इन जैसे जो अन्य लाखों बाबू हैं, उन्हें भी पता नहीं।

दफ़्तर बंद हो गया, चौकीदार सब दरवाजे पर ताले टटोल कर देख चुका था। धूप लाजवंती वधू की तरह सिमट कर क्षितिज के पीछे जा छिपी। अंधकार चोर की तरह चुपके–से दफ़्तर के कमरों में से गुज़रता हुआ सड़क, मैदान और खेतों पर पाले की तरह छा गया। छोटे बाबू के कमरे में घुप्प अँधेरा और सन्नाटा था। जान पड़ता था जैसे बरसों से इस कमरे में कोई नहीं आया। तभी इस सन्नाटे में किसी की क्षीण–सी आह सुनाई दी - दबी हुई ठंडी साँस भी उस के साथ मिली थी… ‘कौन है यह?’ बड़े साहब की कुर्सी ने सहानुभूति पूर्ण स्वर में पूछा। दफ़्तर बंद होने के बाद कमरे के शासन में वह कठोरता नहीं थी जो मीठी–मीठी पॉलिश की हुई बातें करने वाले बड़े साहब में थी।

‘यह मैं हूँ ।’ छोटे बाबू की मेज़ पर रखी क़लम ने पतली आवाज़ में कहा। कमरे के अन्य सदस्य बड़े साहब की कुर्सी, दवात, पेपरवेट, रद्दी की टोकरी आदि पर बच्चों का–सा स्नेह रखते थे क्योंकि यह अभी नई ही आई थी। इस के स्थान पर जो पुरानी कलम थी उस की आकस्मिक मृत्यु एक एक्सीडेंट में हो गई थी।

‘यह मैं हूँ, छोटे बाबू की कलम ने फिर कहा, जिसे सुन कमरे के सदस्यगण चिन्तित हो उठे। परिवार में आई नव-वधू के मुख पर आह क्यों? अभी तो उस के खेलने–खाने के दिन हैं!'

‘क्या बात है, किस बात का दुख है?' बड़े साहब की कुर्सी ने फिर पूछा।

‘कुछ नहीं, कुछ नहीं, यूँ ही मुख से आवाज़ निकल गई थी।’ छोटे बाबू की क़लम ने हँसने का बहाना करते हुए कहा। ‘नहीं जी, कुछ बात ज़रूर है। आज जब से दफ़्तर बंद हुआ है तभी से मैं तुम्हें बेचैन देख रहा हूँ। क्या बात है बोलो?’ छोटे बाबू की दवात ने ज़रा रौब जमाते हुए खोखली आवाज़ में कहा। इस रौब का असर हुआ, कमसिन क़लम सहमी हुई बोली, ‘बड़ी भयानक बात है जीजी, पर आज नहीं बताऊँगी, कल बताऊँगी।’

‘अजी मियाँ, हटाओ भी, किस चक्कर में पड़े हो?’ अचानक ही कोई भारी ठस्स आवाज़ बोली, ‘यहाँ हम अपने ही चक्कर में पड़े हैं। खुदा की कसम आज दोपहर से इतना गुस्सा आ रह है इस मरदूद बड़े साहब पर कि कुछ पूछो मत। बेचारे छोटे बाबू को इतना डाँटा कि उन का मुँह उतर गया। अगर मैं होता न छोटे बाबू की जगह तो सब साहबी एक ही झापड़ में निकाल देता।’ कमरे में अंधकार स्वयं इधर–उधर भटक रहा था, दिखाई कहाँ से देता। हाँ, आवाज़ से मालूम होता था कि छोटे बाबू की मेज़ पर रखे पेपरवेट महाशय बोल रहे हैं।

छोटे बाबू से इस कमरे के सब निवासियों की सहानुभूति थी, बड़े साहब की हरकत पर सब को असंतोष था, पर अभी तक प्रकट किसी ने नहीं किया था। पेपरवेट की बात सुन कर सब ने अपना–अपना असंतोष प्रकट करना आरंभ कर दिया। कमरे में शोर होने लगा। सभी अपनी–अपनी हाँक रहे थे। ख़ूब गुलगपाड़ा मचा हुआ था। तभी सहसा दरवाजे. पर टँगे पर्दे की सरसराती हुई आवाज़ आई, ‘दुश्मन!’ और सब एकदम चुप हो गए मानो किसी ने बड़बड़ाता रेडियो एकदम बंद कर दिया हो। बाहर बरामदे में चौकीदार खटखट करता गुज़र गया। कमरे में फिर से बड़े साहब की आलोचना होने लगी। तभी खटखटाती हुई आवाज़ में टाइपराइटर ने कहा, ‘भई ग़लती तो असल में मेरी थी, छोटे बाबू ने तो अपनी तरफ़ से ठीक ही टाइप किया था। क्या बताऊँ जब से इस पक्के फ़र्श पर गिर कर चोट लगी है, मुझ से ठीक से काम नहीं होता। दर्द बहुत होता है। मुझे अफ़सोस है कि मेरे कारण बेचारे छोटे बाबू को अपमानित होना पड़ा।’

बड़े साहब की मेज़ के नीचे कुछ झन–झन की अवाज़ हुई, बड़े साहब की मेज़ ने जोर से चिल्ला कर कहा, ‘ठहरो, माँजी कुछ कर रही हैं।’

रद्दी की टोकरी इस कमरे के निवासियों में सब से बूढ़ी थी। दफ़्तर पहले किसी और स्थान पर था परन्तु जब यह नया भवन बना तब यही एक थीं जो वहाँ से बच कर यहाँ आ गई थी। इस के साथ के कई साथी गंदे नाले के रमणीय तट पर बसे कबाड़ी आश्रम में अब भगवत भजन में शेष जीवन बिता रहे हैं। कमरे के अन्य निवासी इन्हें बड़ी श्रद्धा की दृष्टि से देखते थे और माँजी कह कर पुकारते थे। माँजी अब बहुत वृद्ध हो गई थीं। अब और तब का सवाल था। आवाज़ भी काफ़ी मद्धम पड़ गई थी। वह छनछनाती आवाज़ में बोली, ‘क्या बताऊँ। उस दिन मुझ से ग़लती हो गई, वरना बड़े साहब तो बँधे–बँधे फिरते।’

‘वह जो उस दिन सरकारी सर्कुलर आया था, वह बड़े साहब ने जल्दी में भूल से मेरे हवाले कर दिया। चपरासी जब रद्दी को बाहर जमादार के डोल में डालने लगा तो वह सर्कुलर मैंने अपनी गोद में बच्चे की तरह छिपा लिया। अगले दिन जब उसके बारे में सारे दफ़्तर में कोहराम मचा तो मैंने निकाल कर दे दिया। जो कहीं उस दिन वह काग़ज मैं जाने देती तो बड़े साहब को भी पता चल जाता कि साहबी कितनी महँगी है। भैया, जो बुड्ढे कर देते हैं, वह आजकल की छोकरियाँ क्या करेंगी? इन्हें तो अपनी सिंगार–पटार से ही फुरसत नहीं। कोई चीज़ कहीं पड़ी है, कोई कहीं, किसी बात का ध्यान ही नहीं। बस मैं सँभालूँ। जिन्हें सब दुत्कारते हैं उन्हें मैं सँभालती हूँ। अपनी गोद में उनको जगह देती हूँ, जिन्हें दुनिया किसी काम का नहीं कहती। इस पर नाम मेरा रखा है– रद्दी की टोकरी। खैर, इसका मुझे मलाल नहीं क्योंकि इतनी उम्र तक दुनिया देखी है। यह देखा है कि जिस का भला करो उसी से बुराई मिलती है। पर छोड़ो इन बातों को। अब हमें क्या लेना–देना है? उमर ही कितनी रह गई है? खाट से चिपकी बुढ़िया हूँ अब गई तब गई की बात है और फिर…...!’ न जाने यह बुढ़िया-पुराण कब तक चलता यदि मुर्गे की बाँग भिनसार की ठंडी हवा की अँगुली पकड़े रोशनदान के रास्ते से कमरे में न घुस जाती।

आज दफ़्तर खुलते ही जो बेचैनी नज़र आई वह इस दफ़्तर के लिए नई थी। बेचारा दफ़्तर परेशान था, उसे समझ नहीं आ रहा था कि आज इन सब को क्या हो गया है? बड़े साहब से ले कर चपरासी तक सब बेचैन, उदास घबराए–से क्यों हैं? उसे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था। आख़िर हारकर उस ने आँगन में खड़े आम के पुराने पेड़ से पूछा। शायद उसे कुछ पता हो–पर वह इन नए छोकरों की अजीब बातों से परेशान था। उसने भी अपना सिर खुजलाया जिस का मतलब था कि इस बेचैनी का कारण उसे भी पता नहीं। किस से पूछा जाए? शायद फ़ाटक को पता हो, पर तभी आँगन से कुछ बातचीत की आवाज़ें आने लगीं… 'पर आख़िर छोटे बाबू ने आत्महत्या की क्यों?’ कोई पूछ रहा था।

‘अच्छा तो यह बात थी, बहुत बुरा हुआ।’ दफ़्तर ने सोचा और बात–बात में यह खबर दीवारों, दरवाज़ों, चिकों, पर्दों से होती हुई दफ़्तर में चारों ओर फैल गई। छोटे बाबू की आकस्मिक और करूणाजनक मृत्यु के कारण शोक छाया हुआ था। प्रत्येक व्यक्ति अपनी समझ के अनुसार उनकी आत्महत्या का कारण बता रहा था। बड़े साहब कह रहे थे, ‘अगर ऐसी बात थी तो उन्होंने मुझे कहा क्यों नहीं? मैं उनकी तनख्वाह ज़रूर बढ़ा देता।’ सुनने वाले एक वही ठेकेदार साहब थे जो अपने किसी ठेके के सिलसिले में दफ़्तर में आए थे। बोले, ‘साहब यह रूपए–पैसे की तंगी बुरी चीज़ है, पर उन्होंने तो किसी से कुछ कहा ही नहीं, मुझे ही कह देते तो दो–चार हज़ार का इंतजाम तो मैं ही कर देता।’

‘कहो भाई, क्या ख़बर लाए?’ बड़े साहब ने फ़ाटक में से आते हुए एक आदमी से पूछा। ‘बहुत बुरा हाल है, बेचारी छोटे बाबू की वाइफ़ ने तो रो–रो कर बुरा हाल कर रखा है, घर में जमा पूँजी भी नहीं है जो क्रिया–कर्म का प्रबंध किया जाए। यह चूड़ियाँ दी हैं, बेचने के लिए!’ उस आदमी ने कहा।

‘अजी, अब रोने–धोने से क्या होता है? उम्र भर तो छोटे बाबू के कान खाती रही– यह ला दो, वह ला दो और सच तो यह है…’ पास खड़े एक अन्य व्यक्ति ने कहा, पर बीच में ही आने वाले व्यक्ति ने टोका।

‘पता नहीं साहब, वह तो मुझसे कह रही थीं कि इतने सीधे आदमी थे कि ख़ुद ही सब सामान ला दिया करते थे, मुझे कुछ कहने की ज़रूरत ही नहीं होती थी। खैर, जो भी हो अब बेचारी का दुख नहीं देखा जाता, आज दफ़्तर तो बंद ही रहेगा, हम सब को वहीं जाना चाहिए।’

दफ़्तर बंद हो गया, बड़े साहब कार में बैठ कर घर चले गए। ठेकेदार भी कुछ आवश्यक कार्य के लिए उन के साथ ही गया। बड़े साहब जाते हुए चपरासियों और चौकीदारों को सख्त ताक़ीद कर गए कि छोटे बाबू के घर वे ज़रूर जाएँ। चपरासियों ने कमरों में ताले लगाए और छोटे बाबू के घर की ओर चल पड़े। दफ़्तर में फिर एक बार शोकपूर्ण सन्नाटा छा गया।

‘बहुत ही बुरा हुआ', सब से पहले छोटे बाबू की कुर्सी ने दुख से रूँधे गले से कहा।

‘यह और भी बुरा हुआ कि उन्होंने अपनी मदद के लिए किसी से कुछ कहा भी नहीं।’ इस पर कमरे के सब छोटे–बड़े सदस्य छोटे बाबू के प्रति अपना शोक प्रकट करने लगे।

‘यह जो कहा जा रहा है कि उन्होंने किसी से मदद नहीं माँगी, यह ग़लत है।’ छोटे बाबू की क़लम ने दवात से कहा, ‘कल जो बात मैं कहते–कहते रूक गई थी, वह यही थी।’

‘अरे भई, कुछ सुनते भी हो?’ दवात ने ऊँची आवाज़ में कमरे वालों को बातें करने से रोका, ‘ज़रा सुनो तो यह क़लम क्या कह रही है? हाँ जी, अब कहो असली बात क्या है?’

सब चुप हो गए, पर अब कमसिन क़लम शर्माने लगी। दवात ने ढाढ़स बँधाया कि सब अपने ही हैं, शर्माने की क्या बात है, तुम बेखटके कहो।

क़लम ने धीरे स्वर में कहना आरंभ किया, ‘यह बात ग़लत है कि छोटे बाबू ने किसी से मदद नहीं माँगी।
उन्होंने बड़े साहब से तनख्वाह बढाने के लिए कितनी ही बार कहा था पर बड़े साहब ने हर बार उन के काम में ज़बरदस्ती कोई न कोई कमी निकाल कर इस बात को टाल दिया। कल जब वे घर से दफ़्तर आए थे तो आप सब ने देखा होगा कि उनका चेहरा उतरा हुआ था। बात यह थी कि उनकी पत्नी ने उन्हें काफी खरी–खोटी सुनाई थी कि वे वक्त पर कोई चीज़ ला कर नहीं देते। मुझे भी कोई ज़ेवर–पत्ता बनवा के नहीं दिया , इत्यादि। इसी सब झगड़े में देर हो गई, उधर आते ही बड़े साहब ने डाँट सुना दी, फिर दोपहर को भी जो बुरी डाँट उन पर पड़ी थी वह तो आप सबने सुनी ही है। इधर उन पर क़र्ज भी काफ़ी हो गया था। तक़ाजा दिनों-दिन सख्त होता जा रहा था। पत्नी की फ़रमाइश, लंबे–चौड़े परिवार का ख़र्च, साहूकारों के तक़ादे। यह सब इस छोटी–सी तनख्वाह में कैसे पूरे हो पाते? उन का दिल तो पहले ही टूट गया था, पर कल पत्नी की फटकार और बड़े साहब की डाँट ने उस टूटे हुए दिल को पीस डाला। वह निराश हो गए और सब से अधिक धक्का इस बात से लगा कि जब उन्होंने अपनों के आगे गिड़गिड़ा कर मदद के लिए हाथ पसारा तो उन्होंने साफ़ इनकार कर दिया।’

‘पर तुम्हें यह सब पता कैसे लगा?’ बड़े साहब की कुर्सी ने आगे खिसकते हुए पूछा।

‘बात यह हुई कि कल शाम दफ़्तर बंद होने से पहले ये सब बातें उन्होंने एक पत्र में लिखीं, पर न जाने फिर क्या सोच कर वह पत्र फाड़ कर फेंक दिया। मैंने तो सब लिखी ही थीं, इसलिए मुझे बातें याद रहीं।’

‘जी तो चाहता है कि इनसान की गरदन रेत दूँ।’ चाकू ने तीखी आवाज़ में कहा। उस पर क्रोध की धार लगी हुई थी।

‘अरे एक बात तो भूल ही गई,’ क़लम ने फिर कहा। ‘उन्होंने पत्र के अंत में हम सब को भी याद किया था।’
‘अरे कैसे?’ सब ने आश्चर्य से पूछा।

‘उन्होंने लिखा कि काश मैं पेपरवेट होता, मेज़–कुर्सी की तरह फ़र्नीचर होता तो आज यह दिन न देखना पड़ता। चाहें जो होता पर मैं इनसान न होता।’

‘ओह, तभी तो मुझे उठा कर अपने गालों से सहला रहे थे।’ पत्थर के पेपरवेट की ठस्स आवाज़ गीली हो उठी, उसके आँसू झिलमिला उठे।

 
 
 
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